<strong><em>चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनावी नतीजे (Source: <a href="https://results.eci.gov.in/ResultAcGenMay2026/index.htm">ECI</a>)</em></strong>

चुनावी उलटफेर: जहां पश्चिम बंगाल में बीजेपी और तमिलनाडु में अभिनेता जे विजय की पार्टी टीवीके (तमिलगा वेट्री कड़गम) ने 2026 के विधानसभा चुनावों में निर्णायक बढ़त हासिल की, वहीं केरल में लेफ्ट (वामपंथी दलों के गठबंधन) की हार और यूडीएफ (कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) की सत्ता में वापसी हुई है।

AI और डीपफेक: इन चुनावों में साधारण फेक न्यूज की जगह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक ने ले ली। राहुल गांधी के एडिटेड वीडियो से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एआई-क्रिएटेड तस्वीरों तक, मतदाताओं को भ्रमित करने के लिए एआई की मदद ली गई।

‘विजय लहर’: तमिलनाडु विधानसभा 2026 चुनाव के दौरान वायरल हुआ ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका का वह कवर पेज, जिसमें ‘विजय लहर’ का दावा किया गया था, फेक निकला। हालांकि, नतीजे बताते हैं कि तमिलनाडु में विजय ‘लहर’ थी।

अर्धसैनिक बलों की तैनाती: बंगाल में सीआरपीएफ की रिकॉर्ड तैनाती को सांप्रदायिक रंग देकर भड़काऊ दावों के साथ शेयर किया गया, जिनमें कई वीडियो बांग्लादेश और अन्य जगहों से संबंधित थे।

सकारात्मक ट्रेंड: एक सकारात्मक ट्रेंड यह रहा कि पिछले वर्षों की तुलना में ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) को लेकर भ्रामक दावों और अफवाहों में इस बार बड़ी गिरावट दर्ज की गई।

नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। असम, केरल, पुडुचेरी, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभा 2026 के चुनावी नतीजे आ चुके हैं। बंगाल में जहां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पहली बार सरकार बनाने जा रही है, वहीं असम में वह लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी करने में सफल रही है। तमिलनाडु में विजय फैक्टर ने चौंकाया, वहीं केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) सरकार बनाने जा रही है।

केरल में सीपीआई-एम के नेतृत्व वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की हार के साथ ही अब देश में ऐसा कोई राज्य नहीं बचा है, जहां लेफ्ट पार्टियां सत्ता में हैं। नतीजों के लिहाज से इन चुनावों के नतीजे चौंकाने वाले रहे और उतना ही चौंकाने वाला रहा, चुनावी मिस-इन्फॉर्मेशन और उसका ट्रेंड्स। 

समग्रता में देखें तो अन्य चुनावों की तरह इन चुनावों में भी मिस-इन्फॉर्मेशन का बोलबाला रहा और इसमें डीपफेक की भूमिका चौंकाने वाली रही। पहले के चुनावों में जहां पुराने मल्टीमीडिया का इस्तेमाल कर भ्रामक या फेक दावे किए जाते थे, वहीं अब ऐसा करने के लिए एआई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

इन पांच राज्यों के चुनाव के दौरान वायरल हुए मिस-इन्फॉर्मेशन के ट्रेंड्स में सर्वाधिक चौंकाना वाला फैक्टर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से जुड़े भ्रामक या फेक दावों की संख्या रही, जो लगभग न के बराबर थे। वहीं इन चुनावों के पहले, वोटिंग के दौरान और नतीजों के बाद प्री-पोल या एग्जिट पोल को लेकर भी किसी तरह का मिस-इन्फॉर्मेशन देखने को नहीं मिला। 

15 मार्च को केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) ने पश्चिम बंगाल (23 और 29 अप्रैल), तमिलनाडु (23 अप्रैल), केरल (9 अप्रैल), असम (9 अप्रैल) और पुडुचेरी (9 अप्रैल)समेत चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में चुनाव के तारीखों की घोषणा की, जिसके नतीजे चार मई को आए। नतीजों के मुताबिक, 126 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी 82 सीट के लगातार तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। 

140 विधानसभा सीटों वाले केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन सरकार में वापसी कर रहा है। पुडुचेरी में एनडीए की वापसी हुई है, जहां विधानसभा की कुल 30 सीटें हैं। 234 सीटों वाले तमिलनाडु में अभिनेता जे विजय की पार्टी टीवीके सरकार बनाने जा रही है, जिसे पहले ही चुनाव में 108 सीटें मिली हैं। हालांकि, यह आंकड़ा सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत से थोड़ा पीछे है।

चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनावी नतीजे (Source: ECI)

नतीजों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की 294 सीटों वाली विधानसभा में बीजेपी को 206 सीटे मिली हैं, जो सरकार बनाने के जादुई आंकड़े से बेहद अधिक है। करीब दो महीने की अवधि में ये चुनाव जमीन के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी लड़े गए। जमीनी पकड़ वोट सुनिश्चित करती है, जबकि सोशल मीडिया नैरेटिव को सुनिश्चित करता है और इसी नैरेटिव में फेक और भ्रामक सूचनाओं की मदद ली जाती है और चुनावी मिस-इन्फॉर्मेशन के लिहाज से ये चुनाव भी अन्य चुनावों से अलग नहीं रहे लेकिन ट्रेंड्स के लिहाज से ये चुनाव पिछले चुनावों से काफी अलग दिखे।

विधानसभा चुनाव और AI

2026 के इन विधानसभा चुनावों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल चुनाव प्रचार का एक मुख्य जरिया रहा। विश्लेषकों के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनाव, जहां एआई के इस्तेमाल का ‘पायलट प्रोजेक्ट’ था, वहीं 2026 के इन चुनावों में एआई का बड़े पैमाने पर बेहद बारीकी के साथ इस्तेमाल किया गया।

2026 के चुनाव में टीवीके प्रमुख विजय का 3D होलोग्राम वीडियो उनके प्रचार अभियान का प्रमुख हिस्सा रहा, जिसे AI की मदद से बनाया गया था। इस तकनीक की मदद से विजय एक साथ कई रैलियों को संबोधित करते नजर आए। 

नेताओं की आवाज को एआई के जरिए क्लोन किया गया, ताकि वे लाखों मतदाताओं से व्यक्तिगत रूप से जुड़ सकें। एआई टूल्स का उपयोग करके बड़े नेताओं के भाषणों को रियल-टाइम में क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया गया, जिससे असम और पश्चिम बंगाल जैसे भाषायी विविधता वाले राज्यों में संवाद आसान हुआ।

चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों ने एआई का इस्तेमाल तकनीकी प्रबंधन के लिए किया। केरल में चुनाव आयोग ने पहली बार मतदान केंद्रों पर भीड़ को ट्रैक करने और लंबी लाइनों को मैनेज करने के लिए एआई-पावर्ड सर्विलांस सिस्टम का उपयोग किया।

वहीं, राजनीतिक दलों ने डेटा का विश्लेषण करने के लिए एआई का इस्तेमाल किया, लेकिन इन चुनावों में हमें एआई का दुरुपयोग भी देखने को मिला।

बंगाल चुनाव और इससे जुड़े मिस-इन्फॉर्मेशन में डीपफेक का इस्तेमाल किया गया।  कोलकाता में राहुल गांधी की रैली में उमड़ी भीड़ का दावा करती तस्वीर हो, पूर्व बीजेपी सांसद लॉकेट चटर्जी के तृणमूल कांग्रेस के दफ्तर में सीक्रेट मीटिंग का दावा या फिर बंगाल के शिक्षा मंत्री का रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने का वीडियो। सियासी दुष्प्रचार के लिए इन मामलों में डीपफेक मल्टीमीडिया का इस्तेमाल किया गया।  

तमिलनाडु चुनाव भी इससे अछूता नहीं रहा। मतदान से पहले सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर की गई, जिसमें ‘फ्रंटलाइन’ मैगजीन का कवर पेज शेयर कर यह दावा किया गया कि तमिलनाडु में ‘Vijay Wave’ यानी ‘विजय लहर’ की स्थिति है।

चार मई को आए चुनावी नतीजे इस बात की पुष्टि करते हैं कि तमिलनाडु में विजय लहर थी, लेकिन ऐसा दावा करता फ्रंटलाइन का यह कवर पेज फेक और क्रिएटेड था। नतीजों के मुताबिक, तमिलनाडु में अभिनेता जे विजय की पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) को 234 सीटों वाली विधानसभा में 108 सीटें मिली हैं। वहीं, सत्ताधारी डीएमके 59 सीटों पर सिमट गई। 

असम और केरल चुनाव में भी डीपफेक का इस्तेमाल देखने को मिला। सर्वाधिक चर्चित तस्वीर वह रही, जिसे कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने शेयर करते हुए दावा किया कि असम के चाय बागान में पीएम मोदी की चुनावी यात्रा को कवर करने के लिए फिल्मों की तरह एक सेट का निर्माण किया गया था। ऐसी ही एक तस्वीर केरल के संदर्भ में भी वायरल हुई, जिसमें समान दावा किया गया था।

वास्तविक दिखने वाली ये दोनों तस्वीरें वास्तव में गूगल एआई की मदद से बनाई गई थीं। असम के मामले में एक ऐसा ही डीपफेक वीडियो शेयर कर दावा किया गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को असम चुनाव से दूर रहने की सलाह दी है। हकीकत में यह वीडियो एआई की मदद से बनाया गया था। 

15 मार्च 2026 को चुनावी कार्यक्रम की घोषणा के बाद चुनाव आयोग ने इन चुनावों में डिजिटल दुष्प्रचार को रोकने के लिए सख्त कदम उठाते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भ्रामक या एआई-क्रिएटेड कंटेंट पर शिकायत के तीन घंटे के भीतर कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। 

19 अप्रैल की रिपोर्ट के मुताबिक, आयोग ने बताया कि 15 मार्च से अब तक सोशल मीडिया पर नियमों का उल्लंघन करने वाली 11,000 से ज्यादा पोस्ट पर कार्रवाई की गई है। वहीं, सी-विजिल ऐप के जरिए 3,10,393 शिकायतों का निपटारा किया गया, जिनमें 100 मिनट के अंदर शिकायतों को सुलझाने की दर 96.01% रही।

PM और बंगाल चुनाव

इन विधानसभा चुनावों के सर्वाधिक चर्चित मिस-इन्फॉर्मेशन में से एक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झाड़ग्राम की यात्रा वाली तस्वीर रही, जिसमें रैली से लौटते हुए वह एक स्थानीय झालमुड़ी की दुकान पर रुके थे। दावा किया गया कि जिस व्यक्ति ने उन्हें झालमुड़ी खिलाई, वह कोई स्थानीय दुकानदार नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में तैनात रहने वाला स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी) का एक जवान था।

लेकिन यह एक फेक दावा था, जिसका इस्तेमाल राजनीतिक दुष्प्रचार की मंशा से किया गया। बंगाल चुनाव से जुड़े मिस-इन्फॉर्मेशन में एक और व्यापक ट्रेंड सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) की तैनाती रही। बंगाल में चुनाव दो चरणों में हुए और इस दौरान ऐसे कई वीडियो शेयर किए गए, जो बांग्लादेश और अन्य राज्यों से संबंधित थे। इन वीडियो को चुनाव से पहले सीआरपीएफ की सख्ती और निगरानी के दावे के साथ शेयर किया गया। 

न्यूज रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 के विधानसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अब तक की सबसे बड़ी तैनाती में अर्धसैनिक बलों (CAPF) की लगभग 480 से 500+ कंपनियों को तैनात किया । यह तैनाती 1 मार्च 2026 से शुरू होकर दो चरणों में की गई। इसमें सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ, आईटीबीपी और एसएसबी के जवान शामिल थे। 

इसी संदर्भ में एक वीडियो शेयर कर दावा किया गया कि अपने बंगले के बाहर सीआरपीएफ की तैनाती को देखकर ममता बनर्जी घबरा गईं। सीआरपीएफ की तैनाती के अधिकांश वीडियो को बंगाल के हिंदू मतदाताओं की सुरक्षा के सांप्रदायिक दावे के साथ भी शेयर किया गया।

इस दौरान राहुल गांधी का भी एक ऑल्टर्ड और एडिटेड वीडियो क्लिप वायरल हुआ, जिसे लेकर दावा किया गया कि उन्होंने एक रैली में टीएमसी पर निशाना साधते हुए कहा कि बंगाल में बीजेपी को टीएमसी नहीं, बल्कि कांग्रेस ही मात दे सकती है।

राहुल गांधी का यह वीडियो एडिटेड था, जिसे सियासी दुष्प्रचार की मंशा से शेयर किया गया था। हालांकि, चुनावी नतीजे यह बता रहे हैं कि बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के बीच सीधी टक्कर थी। आंकड़े बताते हैं कि बंगाल की चुनावी जंग में कांग्रेस मुकाबले में भी नहीं थी।

EVM, प्री और एग्जिट पोल्स

पिछले कुछ चुनावों के दौरान ईवीएम से जुड़े मिस-इन्फॉर्मेशन की संख्या में भारी गिरावट आई है। विश्वास न्यूज ने इन चुनावों के दौरान जो फैक्ट चेक रिपोर्ट्स प्रकाशित कीं, उनमें महज एक दावा ईवीएम से जुड़ा हुआ था। बिहार के एक पुराने वीडियो को शेयर कर बंगाल में ईवीएम बदलने का दावा किया गया।

भारत में हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान प्री-पोल और एग्जिट पोल को लेकर मिस-इन्फॉर्मेशन (भ्रामक जानकारी) के ट्रेंड्स में काफी बदलाव देखा गया है। पिछले कुछ चुनावों से अगर तुलना करें तो इससे जुड़े मिस-इन्फॉर्मेशन के मामलों में भारी कमी आई है।

विश्वास न्यूज की फैक्ट चेक की एनालिसिस बताती है कि इन चुनावों के दौरान प्री-पोल और एग्जिट पोल्स से जुड़ा कोई भी मिस-इन्फॉर्मेशन सामने नहीं आया। आम तौर पर इस तरह के मिस-इन्फॉर्मेशन में एजेंसियों और चैनलों के लोगों और ग्राफिक्स का गलत इस्तेमाल किया जाता है। बताते चलें कि चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार, मतदान खत्म होने से पहले एग्जिट पोल दिखाना गैरकानूनी है।

क्या कहती हैं रिपोर्ट?

विश्व आर्थिक मंच की 2026 की रिपोर्ट बताती है कि पिछले पांच सालों में, डीपफेक बनाना ज्यादा आसान, सस्ता और भरोसेमंद हो गया है। हालांकि, 2024 के “सुपर इलेक्शन ईयर” (जब दुनिया के कई देशों में चुनाव हुए) के दौरान डीपफेक का इस्तेमाल अभी भी एक नई चीज थी, लेकिन अब इसका प्रसार तेजी से होने लगा है, जो राजनीति और चुनावी प्रक्रियाओं को प्रभावित कर रहा है।

रिपोर्ट बताती है कि डीपफेक को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने से लोकतांत्रिक संस्थाओं पर से भरोसा कम हो सकता है, जिससे राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है, और इससे लोगों को भड़काया भी जा सकता है। 

डिस्क्लेमर: यह विश्लेषण चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद वायरल हुए दावों की जांच करती विश्वास न्यूज की फैक्ट चेक रिपोर्ट्स पर आधारित है, जिन्हें यहां पढ़ा जा सकता है।

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