नई दिल्ली (विश्वास न्यूज)। वंदे मातरम को लेकर चल रहे विवाद के बीच सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवकों का एक ब्लैक एंड व्हाइट वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में स्वयंसेवकों को डांस करते हुए देखा जा सकता है। इस वीडियो को शेयर कर, आरएसएस पर तंज कसते हुए दावा किया जा रहा है कि यह 1942 का ‘ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन’ (बीबीसी) का आर्काइव फुटेज है। पोस्ट को शेयर करते हुए यूजर्स कह रहे हैं कि 1942 में जब देशवासी वंदे मातरम और इंकलाब जिंदाबाद गा रहे थे, उस समय आरएसएस के कार्यकर्ता अजीब गाने पर डांस कर रहे थे। 

विश्वास न्यूज ने अपनी पड़ताल में पाया कि वायरल दावा गलत है। असल में वायरल हो रहा वीडियो एडिटेड है और साल 2015 का है। साल 2015 में नागपुर में हुए आरएसएस के एक कार्यक्रम के वीडियो को एडिट कर ब्लैक एंड व्हाइट बना दिया गया है और अब उसे गलत दावे के साथ वायरल किया जा रहा है। 

क्या हो रहा है वायरल?

फेसबुक यूजर ‘Ilyas Aziz Khan’ ने 10 दिसंबर 2025 को वायरल वीडियो को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा है, “ब्रिटिश काला-सफ़ेद फुटेज। लाल क़िले से लेकर लाहौर तक सिर्फ़ एक ही आवाज़ गूँज रही थी— वंदे मातरम… इंक़लाब ज़िंदाबाद…तब आरएसएस वाले कैमरे के सामने नाच रहे थे।”

पोस्ट के आर्काइव लिंक को यहां पर देखें।

पड़ताल 

वायरल दावे की सच्चाई जानने के लिए हमने वीडियो को गौर से देखा। हमें वीडियो में नजर आ रहे एक शख्स के हाथ में फोन जैसा कुछ नजर आया। ऐसे में हमें दावे के गलत होने का संदेह हुआ। 

हमने पड़ताल को आगे बढ़ाते हुए इनविड टूल की मदद से कई कीफ्रेम निकाले और उन्हें गूगल रिवर्स इमेज की मदद से सर्च किया। हमें असली वीडियो ‘Zee 24 Taas’ के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर मिला। वीडियो को 17 दिसंबर 2015 को शेयर किया गया था। मौजूद जानकारी के मुताबिक, वीडियो नागपुर में हुए एक कार्यक्रम का है। असली वीडियो में स्‍वयंसेवकों को वायरल वीडियो की तरह हूबहू डांस करते हुए और एक महिला को पास से गुजरते हुए देखा जा सकता है। 

प्राप्त जानकारी के आधार पर हमने गूगल पर संबंधित कीवर्ड्स की मदद से सर्च किया। हमें दावे से जुड़ी एक अन्य रिपोर्ट आजतक के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर मिली। वीडियो को 17 दिसंबर 2015 को अपलोड किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, वीडियो संघ शिक्षा वर्ग की तीसरी वर्षगांठ (तृतीय वर्ष) के एक कार्यक्रम के दौरान का है। इस वीडियो में भी वायरल वीडियो में मौजूद लोगों को डांस करते हुए देखा जा सकता है। 

दोनों वीडियो की समानताओं के नीचे देखा जा सकता है।

विश्‍वास न्‍यूज ने जांच को आगे बढ़ाते हुए संघ से जुड़े सुरुचि प्रकाशन के चेयरमैन राजीव तुली से संपर्क किया। उन्होंने हमें बताया कि आरएसएस की छवि खराब करने के लिए वीडियो को गलत तरीके से वायरल किया जा रहा है। 

नवभारत टाइम्स की वेबसाइट पर 10 दिसंबर 2025 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, “पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में आरोप लगाया था कि कांग्रेस ने 1937 के कलकत्ता अधिवेशन में वंदे मातरम् के कुछ छंद हटाकर राष्ट्रगीत की मूल आत्मा को तोड़ दिया था। पीएम मोदी ने दावा किया कि यह फैसला देश के बंटवारे की दिशा में पहला कदम साबित हुआ। वहीं कांग्रेस ने इन आरोपों का कड़ा विरोध किया और कहा कि निर्णय महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष बोस, मौलाना आजाद सहित शीर्ष नेताओं की सहमति से लिया गया था।”

अंत में हमने वीडियो को गलत दावे के साथ शेयर करने वाले यूजर के फेसबुक अकाउंट को स्कैन किया। हमने पाया कि यूजर को 5.4 हजार लोग फॉलो करते हैं। यूजर ने प्रोफाइल पर खुद को महाराष्ट्र का रहने वाला बताया है। यूजर फरवरी 2010 से फेसबुक पर सक्रिय है। 

निष्कर्ष: विश्वास न्यूज ने अपनी पड़ताल में पाया कि आरएसएस के स्‍वयंसेवकों के डांस करने के वायरल वीडियो को लेकर किया जा रहा दावा गलत है। असल में वायरल हो रहा वीडियो एडिटेड है और साल 2015 का है। साल 2015 में नागपुर में हुए आरएसएस के एक कार्यक्रम के वीडियो को एडिट कर ब्लैक एंड व्हाइट बना दिया गया और अब उसे गलत दावे के साथ वायरल किया जा रहा है। 

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