नई दिल्ली (आशीष महर्षि)। राजनीति में मिस-इन्फॉर्मेशन का तरीका अब पूरी तरह बदल चुका है। वर्ष 2025 में एआई-जेनेरेटेड कंटेंट और डीपफेक का बोलबाला रहा, जिसने असली और नकली के बीच का फर्क मिटा दिया। राजनीतिक रूप से यह साल बेहद सक्रिय रहा। दुनिया भर में लोकतंत्र के महापर्व यानी चुनावों की धूम रही। साल की शुरुआत अमेरिका में 20 जनवरी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह से हुई, जिन्होंने 2024 में चुनाव जीता था। इसके बाद 2025 में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, फिलीपींस, मिस्र, तंजानिया और कैमरून जैसे प्रमुख देशों में चुनाव संपन्न हुए और जनता ने अपनी नई सरकारें चुनीं। वहीं, बांग्लादेश और नेपाल में स्थिति अलग रही। वहां जनता ने सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किए, जिसके परिणामस्वरूप सत्ता परिवर्तन देखने को मिला। इन सबमें डीपफेक, जेनरेटेड एआई कंटेंट, पुराने व असंबंधित वीडियो का इस्तेमाल काफी ज्यादा देखा गया।
यदि भारत के संदर्भ में बात की जाए तो साल 2025 में राजनीतिक दृष्टि से फर्जी व भ्रामक सूचनाओं का अंबार देखने को मिला। इस साल डीपफेक, एआई जेनेरेटड कंटेंट की भरमार रही। दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव में नेताओं, राजनीतिक दलों के कई डीपफेक, फर्जी और पुराने वीडियो व तस्वीरों के जरिए मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश की गई।
विश्व आर्थिक मंच की एक स्टोरी में विस्तार से डीपफेक के खतरों के बारे में बताते हुए चुनावों में इसके खतरनाक इस्तेमाल के बारे में बताया गया। साल 2025 के चुनावों में मिस-इन्फॉर्मेशन (गलत सूचना) और डिस-इन्फॉर्मेशन (भ्रामक प्रचार) के तरीकों में तकनीक की वजह से बड़ा बदलाव आया है। जहां पहले सिर्फ फेक न्यूज चुनौती थीं, अब ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ ने इसे और जटिल बना दिया है। विश्व आर्थिक मंच ने अपनी 2025 की ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में पहले ही चेता दिया था कि सबसे शीर्ष चुनौती मिस-इन्फॉर्मेशन और डिस-इन्फॉर्मेशन की होगी।
यदि वर्ष 2025 में राजनीतिक गलियारों में फैले ट्रेंड की बात की जाए, तो चुनावों के अलावा चुनावी नतीजा और विशेष मतदाता गहन पुनरीक्षण भी काफी चर्चा में रहा। 2025 में भारत में दिल्ली और बिहार चुनाव के बाद आए नतीजों ने फिर से उस पुरानी बहस को हवा दे दी। जिसमें विपक्षी दलों की ओर से बैलेट पेपर से चुनाव करवाने की मांग की जाती है। इतना ही नहीं, इस साल चुनाव आयोग के विशेष मतदाता गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के कारण भी काफी विवाद हुआ। कई बीएलओ की मौत इस कार्य के दौरान हुई। विपक्ष का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने के लिए मतदाताओं से मतदान के अधिकार छीनने के लिए वोटर लिस्ट सर्वे के काम को अंजाम दिया गया।
इन सबके बीच चुनाव आयोग ने मिथ वर्सेज रियलिटी अभियान के तहत मतदाताओं को जागरूक करने का प्रयास किया। इसके अलावा एआई कंटेंट के लिए चुनाव आयोग ने एक गाइडलाइन जारी की। इसमें कहा गया कि यदि किसी पार्टी के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से झूठी एआई सामग्री पोस्ट या शेयर की जाती है, तो उसे रिपोर्ट या नोटिस मिलने के 3 घंटे के भीतर तुरंत हटाना होगा। साथ में सभी राजनीतिक दलों को अपने एआई आधारित प्रचार सामग्रियों का रिकॉर्ड रखना होगा। इसमें उस व्यक्ति या संस्था का नाम और समय दर्ज होना चाहिए, जिसने यह सामग्री तैयार की, ताकि बाद में आयोग जांच कर सके।
डीपफेक को रेग्युलेट करने वाला बिल लोकसभा में पेश
डीपफेक के खतरों के बीच दिसंबर में इस पर अंकुश लगाने के मकसद से शिवसेना के नेता श्रीकांत शिंदे ने लोकसभा में इसे रेग्युलेट करने का प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, जिसमें डीपफेक में चित्रित व्यक्तियों से पूर्व सहमति लेना अनिवार्य किया गया है। प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य भारत में डीपफेक के निर्माण, वितरण और उपयोग को नियंत्रित करने के लिए एक स्पष्ट कानून बनाना है। इसमें डीपफेक टास्क फोर्स की स्थापना का भी प्रस्ताव है, जो शैक्षणिक और निजी क्षेत्र के संस्थानों के साथ मिलकर हेरफेर की गई सामग्री का पता लगाने में मदद करेगा। इस बिल में एडवांस्ड इमेज मैनिपुलेशन का पता लगाने और उसे रोकने के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की पहलों का समर्थन करने को एक कोष स्थापित करने का भी प्रस्ताव है।
वहीं, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की ग्लोबल रिस्क्स रिपोर्ट 2025, AI-जेनरेटेड डिस-इन्फॉर्मेशन (डीपफेक सहित) को वैश्विक चुनावों, विशेष रूप से लोकतांत्रिक देशों की चुनावी विश्वसनीयता और सामाजिक सद्भाव के लिए बड़ा खतरा बताती है। वहीं, यूनेस्को (UNESCO) ने भी जेनरेटिव एआई (डीपफेक समेत) का उपयोग कर चुनावों को प्रभावित करने के तरीकों पर अपनी रिपोर्ट ‘Generative AI and Elections: Addressing the Risks, Protecting Democracy’ में बताया है कि कैसे 2024 और 2025 में हुए चुनावों में राजनीतिक डीपफेक ऑडियो और वीडियो के मामलों में वृद्धि दर्ज की गई।

राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी से संबंधित वायरल हुए सर्वाधिक दावे
विश्वास न्यूज ने जब अपने यहां प्रकाशित खबरों का एनालिसिस किया, तो पता चला कि वर्ष 2025 में राहुल गांधी को लेकर कुल 58 फैक्ट चेक खबरें पब्लिश हुई हैं। बिहार चुनाव से लेकर दिल्ली चुनाव, संविधान दिवस हो या फिर राहुल गांधी से जुड़ी कोई रैली, हर बार राहुल गांधी को कहीं न कहीं निशाना बनाया गया। पीएम मोदी को लेकर 23 फैक्ट चेक इस दौरान पब्लिश किए गए, जो कि पूरी तरह राजनीतिक थे। इसी तरह यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर भी झूठ फैलाया गया। उनसे जुड़ी 20 से ज्यादा फर्जी और भ्रामक सोशल मीडिया पोस्ट की जांच की गई। इसमें वीडियो, डीपफेक और एआई जेनेरेटड कंटेंट शामिल रहे। वहीं, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लेकर 19 और यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जुड़े 17 झूठ की सच्चाई पाठकों के सामने रखी गई।

डीपफेक के खतरे का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2025 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, होम मिनिस्टर अमित शाह, आरजेडी सांसद मनोज झा, टीएमसी की सांसद सागरिका घोष जैसे कई वरिष्ठ नेताओं के डीपफेक वीडियो के जरिए झूठ फैलाने की कोशिश की गई। एआई जेनेरेट तस्वीरों के जरिए राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी, पीएम मोदी की छवि खराब करने की कोशिश की गई। कांग्रेस की तेज-तर्रार प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत की ऐसी तस्वीरों को वायरल किया गया, जो कि एआई टूल की मदद से बनाई गई थीं।
दिल्ली से ज्यादा बिहार चुनावों में रहा फेक/भ्रामक खबरों का बोलबाला
लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, मिस-इन्फॉर्मेशन और डिस-इन्फॉर्मेशन एक बड़े खतरे के रूप में चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों और मतदाताओं के सामने खड़ी रहती है। इस साल भी यह देखने को मिला। साल की शुरुआत में दिल्ली में विधानसभा चुनाव थे, तो साल के अंत में बिहार में चुनाव हुए। इसमें न सिर्फ परंपरागत तरीकों से झूठ फैलाया गया, एआई बेस्ड झूठे कंटेंट को भी चुनावी मैदान में उतारा गया। डीपफेक जैसे कंटेंट का इस्तेमाल मतदाताओं को भ्रमित करने और उम्मीदवारों के खिलाफ दुष्प्रचार करने में हुआ।

यदि चुनावों के दौरान फैलने वाले झूठ की बात की जाए तो सोशल मीडिया एक बड़ा हथियार बनकर सामने आया है। तकनीक के बदलाव के साथ डीपफेक वीडियो, एआई जेनेरेटड कंटेंट, एडिटेड वीडियो का इस्तेमाल काफी किया जाता है। इस साल दो बड़े चुनाव हुए। बिहार और दिल्ली के। इनमें ऐसे झूठ फैलाए गए, जिससे मतदाता भ्रमित हो जाए। कई पुराने और असंबंधित वीडियो को बिहार का हालिया वीडियो बताकर यह बताने की कोशिश की गई कि जनता राज्य में नेताओं के खिलाफ सड़क पर उतर आई है। इसके अलावा चुनाव जीतने से पहले कुछ उम्मीदवारों की जीत के फर्जी दावों को भी वायरल किया गया।
चुनावों पर विश्वास न्यूज के फैक्ट चेक रिपोर्ट्स का एनालिसिस इन ट्रेंड्स की पुष्टि करता है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दौरान BJP, JDU नेताओं की रैली के वीडियो को AI की मदद से मैनिपुलेट करते हुए, उसमें ‘वोट चोर, गद्दी छोड़’ का नारा जोड़ा गया। इसके अलावा ऐसे कई अन्य डीपफेक वीडियो वायरल हुए, जिनका मकसद बिहार चुनाव के दौरान मतदाताओं को प्रभावित करना था।

यदि (विश्वास न्यूज की फैक्ट चेक रिपोर्ट्स आधारित) आंकड़ों की बात की जाए तो बिहार चुनाव में 163 से ज्यादा फैक्ट चेक विश्वास न्यूज ने किया, जबकि दिल्ली में यह संख्या मात्र 22 की। इससे यह साफ होता है कि सोशल मीडिया की दुनिया में दिल्ली चुनाव से ज्यादा बिहार चुनाव की चर्चा रही। बिहार चुनाव में कभी चुनाव के फेक शिडयूल, तो कभी नेताओं के पुराने वीडियो और तस्वीरों को असंबंधित दावों के साथ वायरल किया गया। इतना ही नहीं, फेक एग्जिट पोल तक चुनाव के नाम पर वायरल किए गए। जिसकी पड़ताल करने के बाद विश्वास न्यूज ने अपने पाठकों के सामने सच्चाई रखी।
चुनाव आयोग ने कसी कमर
वर्ष 2025 में हुए विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने भी कमर कसी थी। इसके लिए आयोग ने बाकायदा अपनी वेबसाइट पर मिथ वर्सेज रियलिटी टैग के साथ एक सेक्शन शुरू किया। इसके अलावा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दलों को चेताते हुए कहा था कि कुछ लोग एआई टूल्स की मदद से ‘डीपफेक’ वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर गलत सूचना फैला रहे हैं, जिससे चुनावी माहौल को दूषित किया जा सकता है। टैग में ‘एआई-जेनरेटेड’, ‘डिजिटली एनहांस्ड’ या ‘सिंथेटिक कंटेंट’ जैसे शब्द स्पष्ट रूप से लिखे जाने चाहिए, ताकि जनता को कोई भ्रम न हो। चुनाव आयोग ने मतदाताओं को अलर्ट करने के लिए सोशल मीडिया का भी काफी इस्तेमाल किया।
ऐसे मामलों से निपटने के लिए आयोग ने सभी दलों, उनके नेताओं, उम्मीदवारों और स्टार प्रचारकों को यह सुनिश्चित करने के लिए भी कहा था कि अगर वे कोई एआई-जेनरेटेड या डिजिटल रूप से बदला गया कंटेंट पोस्ट करें, तो उस पर साफ-साफ टैग लगाना अनिवार्य होगा। टैग में ‘एआई-जेनरेटेड’, ‘डिजिटली एनहांस्ड’ या ‘सिंथेटिक कंटेंट’ जैसे शब्द स्पष्ट रूप से लिखे जाने चाहिए, ताकि जनता को कोई भ्रम न हो।

कांग्रेस और बीजेपी से जुड़े दावों की रही प्रमुखता
विश्वास न्यूज ने जब 2025 की अपनी फैक्ट चेक रिपोर्ट्स का विश्लेषण किया, तो पता चला कि भारतीय जनता पार्टी को लेकर हमने 59 फैक्ट चेक रिपोर्ट पब्लिश की थी। जबकि कांग्रेस को लेकर 29 फैक्ट चेक खबरों को प्रकाशित किया गया। दिल्ली चुनाव के वक्त आम आदमी पार्टी और उनके नेताओं को लेकर भी कई प्रकार के फर्जी वीडियो व तस्वीरों को सोशल मीडिया पर फैलाया गया था। उन सबकी भी विश्वास न्यूज ने जांच की थी।
चुनावी संदर्भ में तीन बड़ी चुनौतियां

एआई ने काफी हद तक झूठ की दुनिया को बदल दिया है। जहां पहले पुराने वीडियो, तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ करके अंसंबंधित कंटेंट तैयार किया जाता था, वहीं अब एआई की मदद से ऐसे कंटेंट तैयार किए जाते हैं, जिन्हें कई बार पहचानना आसान नहीं होता है। अब हर किसी के मोबाइल पर एक क्लिक में एआई कंटेंट बड़ी आसानी से बन सकता है। यह एक प्रकार की चुनौती भी है। इसके अलावा समय के साथ AI-जेनरेटेड कंटेंट की क्वालिटी भी सुधरती जा रही है। जिसके कारण आम आदमी कई बार इसे सच समझकर वायरल कर देता है।
Brookings की एक रिसर्च में कहा गया कि लोकतांत्रिक चर्चा को आकार देने में ऑनलाइन इकोसिस्टम का प्रभाव सर्वविदित है। यदि जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की बात की जाए तो चुनावों में यह नई प्रकार की चुनौती है। जेनरेटिव एआई यथार्थवादी चित्र, वीडियो, ऑडियो या टेक्स्ट बनाने में सक्षम है। इसी कारण चुनावों में इसका इस्तेमाल बढ़ जाता है। ऐसे में इसके समाधान के लिए सरकारों से लेकर एआई कंपनियों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और उपयोगकर्ताओं के बीच बीच समन्वय की आवश्यकता होगी।
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत जैसे देश के लिए एआई दोधारी तलवार है। खासतौर से चुनाव के वक्त। एआई टूल की मदद से नेताओं के भाषण को देश की कई भाषाओं में अनुवाद करके ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की कोशिश गई। इसके अलावा चुनाव से जुड़े सर्वे में भी एआई की इस्तेमाल किया जाता है। नेताओं के खिलाफ दुष्प्रचार की मंशा से अक्सर ऐसे कंटेंट बनाए जाते हैं, जिनमें सच्चाई नहीं होती है।
देश में फेक/भ्रामक न्यूज को लेकर चुनाव आयोग से लेकर केंद्र सरकार तक सक्रिय हैं। इसके अलावा जिले व राज्य के स्तर पर भी फर्जी खबरों को रोकने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) फॉल्स /फेक न्यूज/अफवाह फैलाए जाने से संबंधित मामलों को आईपीसी की धारा 505 के तहत दर्ज करता है। एनसीआरबी की 2023 की वार्षिक रिपोर्ट ‘क्राइम इन इंडिया’ के मुताबिक,2023 में फॉल्स या फेक न्यूज के कुल 1,087 मामले दर्ज किए गए, जो 2022 के मुकाबले करीब 27 फीसदी अधिक हैं।
एआई और लोकतंत्र विषय पर यूनेस्को की रिपोर्ट में कई सिफारिशों को स्थान दिया गया है। एआई को लेकर लोगों की समझ बढ़ाने के लिए एजुकेशन और अवेयरनेस पर ध्यान देने को कहा गया है। इसके अलावा इसमें रेगुलेशन से ज्यादा डायलॉग पर ध्यान देने को कहा गया है।
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